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विशेष और समवाय क्या हैं? वैशेषिक दर्शन में अर्थ, उदाहरण एवं अंतर

वैशेषिक दर्शन में 'विशेष'(Particularity) क्या है? अर्थ और उदाहरण

'विशेष' वैशेषिक दर्शन का पाँचवाँ पदार्थ है। यह सामान्य के ठीक विपरीत है। विशेष नित्य द्रव्य की वह विशिष्टता है जिससे वह अन्य नित्य द्रव्यों से पहचाना जाता है। दिक्, काल आत्मा, मन, पृथ्वी, वायु, जल और अग्नि के परमाणुओं की विशिष्टता की व्याख्या के लिये विशेष को अपनाया जाता है।

ये द्रव्य निरवयव (बिना किसी भाग या हिस्से के) होते है। अतः इन द्रव्यों को एक दूसरे से अलग करना काफी कठिन होता है। इतना ही नहीं, एक ही प्रकार के विभिन्न द्रव्यों को एक दूसरे से अलग करना काफी कठिन होता है। उदाहरण के लिए:

  • एक जल के परमाणु को वायु के परमाणु से किस प्रकार का अन्तर बतलाया जाय?
  • एक आत्मा को मन से किस प्रकार भिन्न समझा जाय?
  • एक आत्मा और दूसरे आत्मा से क्या विभिन्नता है?
  • एक मन और दूसरे मन में क्या विभिन्नता है?
वैशेषिक दर्शन के विशेष और समवाय पदार्थ का अर्थ और अंतर दर्शाती तालिका

यदि इन द्रव्यों के अवयव(हिस्से) होते तो एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य से अवयव की भिन्नता के कारण अलग समझा जाता । परन्तु ये निरवयव हैं। अतः इन द्रव्यों में विशेष को समवेत माना जाता है।

इसी 'विशेष' के कारण ही:-

  • प्रत्येक निरवयव नित्य द्रव्य विशेष के कारण एक दूसरे द्रव्य से अलग होता है।
  • एक आत्मा दूसरी आत्मा से विशेष के कारण ही भिन्न समझी जाती है।
  • इस प्रकार एक मन दूसरे मन से विशेष के कारण ही भिन्त्र समझा जाता है।
  • विशेष के कारण ही दिक, काल, आत्मा आदि नित्य द्रव्यों से भित्र माने जाते हैं।

अतः विशेष नित्य द्रव्यों में रहता है और उन्हें परस्पर अलग करता है। इसीलिए विशेष की स्वतन्त्र सत्ता मानी गई है।

विशेष की विशेषताएँ:-

  • विशेष नित्य है:क्योंकि जिन द्रव्यों में यह निवास करता है वे नित्य हैं।
  • विशेष असंख्य है:क्योंकि जिन द्रव्यों में यह निवास करता है वे असंख्य हैं।
  • विशेष अदृश्य (imperceptible) हैं।:वे परमाणु की तरह अप्रत्यक्ष हैं। विशेष स्वतः पहचाने जाते हैं।

अनवस्था दोष से बचाव का तर्क:

अगर विशेषों को एक दूसरे से अलग करने के लिए अन्य विशेष माने जायें तो उन विशेषों को भी परस्पर अलग करने के लिए अन्य विशेष मानने पड़ेंगे जिसके फलस्वरुप अनवस्था दोष का आविर्भाव होगा ।

सामान्य और विशेष में अन्तर:

सामान्य और विशेष में अन्तर यह है कि सामान्यों के द्वारा वस्तुओं का एकीकरण होता है। परन्तु विशेष के द्वारा वस्तुओं का पृथक्करण होता है।

विशेष की वैशेषिक-दर्शन में महत्ता:

वैशेषिक दर्शन में विशेष का अत्यधिक महत्त्व है। इस दर्शन का नामकरण विशेष को एक स्वतन्त्र पदार्थ मानने के कारण हुआ है।

अन्य दर्शनों का दृष्टिकोण

  • नव्य न्याय:- विशेष को स्वतन्त्र पदार्थ नहीं मानता। इसके मतानुसार अगर विशेष अपना भेद (अंतर) स्वयं कर सकते हैं तो परमाणुओं को एक-दूसरे से अलग सिद्ध करने के लिए 'विशेष' नामक अतिरिक्त पदार्थ की कल्पना करना अनावश्यक है।
  • वेदान्त दर्शन:- में भी विशेष को पदार्थ के रुप में मान्यता नहीं मिली है।
वैशेषिक दर्शन में नित्य द्रव्यों और परमाणुओं के विशेष पदार्थ का चित्र

विशेष को स्वतंत्र पदार्थ मानने के वैशेषिक तर्कों का सार:

  1. वैशेषिक ने विशेष को एक स्वतन्त्र पदार्थ माना है। उनका कहना है कि विशेष उतना ही वास्तविक है जितना कि आत्मा या अन्य पदार्थ जिनमें वह निवास करता है। यदि नित्य द्रव्यों की सत्ता है तब उन द्रव्यों को पृथक् करने वाला गुण भी वास्तविक है।
  2. विशेष को अलग पदार्थ मानने का दूसरा कारण अन्य पदार्थों से इसकी भित्रता है। यह द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य से भित्र है। अतः विशेष को स्वतंत्र पदार्थ मानना युक्ति-युक्त है।

समवाय (Inherence) क्या है उदाहरण के साथ

समवाय एक प्रकार का सम्बन्ध है । समवाय वह सम्बन्ध है जिसके कारण दो पदार्थ एक दूसरे में समवेत रहते हैं।

अयुतसिद्ध (Inseparable) वस्तुओं का संबंध

समवाय संबंध केवल 'अयुतसिद्ध' वस्तुओं के बीच ही पाया जाता है। अयुत्त-सिद्ध वस्तुएँ वे हैं जिनका अस्तित्व अलग नहीं रह सकता।

अयुतसिद्ध वस्तुओं के प्रमुख उदाहरण:
  • गुण और द्रव्य
  • कर्म और द्रव्य
  • सामान्य और व्यक्ति
  • अवयवी (whole) और अवयव (part) अयुत्त-सिद्ध वस्तुएँ हैं।

इन्हीं वस्तुओं के बीच, अर्थात् गुण और द्रव्य, कर्म और द्रव्य, सामान्य और व्यक्ति के बीच, समवाय सम्बन्ध विद्यमान रहता है। धागों और कपड़े के बीच, गुलाब के फूल और सुगन्ध के बीच जो संबंध है वह समवाय सम्बन्ध का परिचायक है।

समवाय की मुख्य विशेषताएँ

  1. समवाय संबंध नित्य होता है। कुर्सी और उसके अवयवों के बीच जो सम्बन्ध है वह नित्य है। कुर्सी की उत्पत्ति के पूर्व और नाश के बाद भी अवयव विद्यमान रहते हैं।
  2. समवाय एक ही होता है। इसके विपरीत विशेष अनेक होते हैं।

समवाय पर विभिन्न दर्शनों का दृष्टिकोण

  • प्रभाकर-मीमांसा ये समवाय को अनेक मानते हैं। प्रभाकर के मतानुसार नित्य वस्तुओं का समवाय नित्य और अनित्य वस्तुओं का समवाय अनित्य होता है।
  • न्याय-वैशेषिक में एक ही नित्य समवाय माना गया है। समवाय अदृश्य है। इसका ज्ञान अनुमान से प्राप्त होता है।
  • वैशेषिक के मतानुसार समवाय का ज्ञान प्रत्यक्ष से संभव नहीं है। वैशेषिक के समवाय सम्बन्ध के इस पक्ष की व्याख्या करते हुए डा राधाकृष्णन् ने कहा है कि "समवाय सम्बन्ध का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, किन्तु वस्तुओं के पृथक् न हो सकने वाले सम्बन्ध से इसका केवल अनुमान किया जा सकता है"
  • न्याय दर्शन समवाय का ज्ञान प्रत्यक्ष से मानता है।

समवाय और संयोग (Conjunction) का सम्बन्ध

समवाय को अच्छी तरह समझने के लिये वैशेषिक द्वारा प्रमाणित दूसरे सम्बन्ध-संयोग-पर विचार करना परम आवश्यक है। वैशेषिक के मतानुसार संयोग और समवाय दो प्रकार के सम्बन्ध हैं।

संयोग (Conjunction) क्या है?

संयोग एक अनित्य(अस्थायी) सम्बन्ध है। अलग- अलग वस्तुओं का कुछ काल के लिये परस्पर मिलने से जो सम्बन्ध होता है, उसे 'संयोग' (Conjunction) कहा जाता है।
उदाहरणस्वरुप पक्षी वृक्ष की डाल पर आकर बैठता है। उसके बैठने से वृक्ष की डाल और पक्षी के बीच जो सम्बन्ध होता है उसे 'संयोग' कहा जाता है। यह सम्बन्ध अनायास हो जाता है। कुछ काल के बाद यह सम्बन्ध टूट भी सकता है। इसीलिये इसे अनित्य सम्बन्ध कहा गया है।

वैशेषिक दर्शन के छठे पदार्थ समवाय का अर्थ और उदाहरण दर्शाने वाला चित्र

यद्यपि समवाय और संयोग दोनों सम्बन्ध हैं, फिर भी दोनों के बीच अनेक विभिन्नताएँ हैं ये विभिन्नताएँ संयोग और समवाय के स्वरुप को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं। इसलिये इन विभिन्नताओं की महत्ता अधिक बढ़ गई है। अब इनकी चर्चा अपेक्षित है।

संयोग और समवाय के बीच मुख्य अंतर:

1.पदार्थगत स्थिति

संयोग:- वैशेषिक दर्शन में संयोग को एक स्वतन्त्र पदार्थ के रुप नहीं माना गया है। गुण एक स्वतन्त्र पदार्थ है। गुण चौबीस प्रकार के होते हैं। उन चौबीस प्रकार के गुणों में 'संयोग' भी एक प्रकार का गुण है।
समवाय :- परन्तु समवाय को वैशेषिक ने एक स्वतन्त्र पदार्थ के रुप में माना है। यह छठा भावात्मक पदार्थ है।

2.स्थायित्व

संयोग:- संयोग अनित्य (temporary) सम्बन्ध है। दो अलग- अलग वस्तुओं के संयुक्त होने से 'संयोग' सम्बन्ध होता है। रेलगाड़ी और प्लेटफार्म के बीच जो सम्बन्ध होता है, वही संयोग है। यह सम्बन्ध अल्पकाल(कुछ समय) तक ही कायम रहता है। रेलगाड़ी ज्यों ही प्लेटफार्म से अलग होती है, यह सम्बन्ध दूर हो जाता है। इस सम्बन्ध का आरम्भ और अन्त सम्भव है।
समवाय :-इसके विपरीत समवाय नित्य (eternal) सम्बन्ध है। यह ऐसी वस्तुओं के बीच विद्यमान होता है जो अयुतसिद्ध हैं। उदाहरणस्वरुप द्रव्य और गुण के बीच जो सम्बन्ध है वह शाश्वत है। इसी प्रकार मनुष्य और मनुष्यत्व के बीच जो समवाय सम्बन्ध हे वह भी नित्य है।

3.संबंध की आवश्यकता

संयोग:- संयोग एक आकस्मिक सम्बन्ध (accidental relation) है। यदि दो विपरीत दिशाओं से दो गेंदें आकर एक दूसरी से मिलती हैं तो उनके मिलन से उत्पत्र सम्बन्ध संयोग है। दोनों गेंदों का मिलन अकस्मात् कहा जाता है। एक गेंद के न रहने पर भी दूसरी गेंद का अपना अस्तित्व बना रहता है। संयोग को संयुक्त वस्तुओं का आकस्मिक् गुण कहा जाता है। संयुक्त वस्तुओं का अलग (वियोग) होने पर संयोग नष्ट हो जाता है।
समवाय :-इसके विपरीत समवाय दो वस्तुओं का आवश्यक सम्बन्ध (essential relation) है। गुलाब और गुलाब की सुगन्ध के बीच जो सम्बन्ध है वह आवश्यक है। यह सम्बन्ध वस्तु के स्वरूप का निर्धारण करता है। यह सम्बन्ध चीजों को बिना विध्वंस किये परस्पर अलग नहीं किया जा सकता

4.कर्म या गति की आवश्यकता

संयोग:- संयोग सम्बन्ध के लिये कर्म आवश्यक है। दो संयुक्त चीजों में क्रियाशीलता दीखती है। वृक्ष और पक्षी के बीच संयोग सम्बन्ध है। इस उदाहरण में दो संयुक्त वस्तुओं में से एक पक्षी क्रियाशील एवं गतिशील है। जब दो विपरीत दिशाओं से आती हुई गेंदें संयुक्त होती हैं तो वहाँ दोनों वस्तुओं में गति दीख पड़ती है।
समवाय :-परन्तु समवाय सम्बन्ध में इस तरह की बात नहीं है। इस सम्बन्ध में गति की अपेक्षा नहीं है। इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि संयोग के लिये कर्म की आवश्यकता है। परन्तु समवाय कर्म पर आश्रित नहीं है।

5.एकतरफ़ा बनाम पारस्परिक

संयोग:- संयोग का सम्बन्ध पारस्परिक होता है। उदाहरणस्वरुप हाथ और कलम के संयुक्त होने पर संयोग सम्बन्ध होता है। वहाँ हाथ कलम से संयुक्त है और कलम भी हाथ से संयुक्त है।
समवाय :-समवाय के सम्बन्ध में यह बात नहीं होती। उदाहरणस्वरुप गुण द्रव्य में समवेत होता है, द्रव्य गुण में नहीं रहता है।

6. बाह्य बनाम आंतरिक संबंध पर दृष्टिकोण

संयोग:-संयोग बाह्य-सम्बन्ध है। फूल और भौरे के बीच जो सम्बन्ध होता है, वह 'संयोग' कहलाता है। इस सम्बन्ध में संयोग की चीजें एक दूसरी से अलग रह सकती हैं। फूल की सत्ता भी भौर से अलग है तथा भौरे की सत्ता भी फूल से अलग रह सकती है। बाह्य सम्बन्ध उस सम्बन्ध को कहा जाता है जिसके द्वारा सम्बन्धित वस्तुएँ एक दूसरी से अलग रह सकती हैं।
समवाय :-समवाय को कुछ विद्वानों ने आन्तरिक सम्बन्ध (internal relation) कहा है। डॉ० राधाकृष्णन् ने समवाय को आन्तरिक सम्बन्ध कहा है 'संयोग' बाह्य सम्बन्ध है, परन्तु समवाय आन्तरिक है समवाय वस्तुओं को सच्चा एकत्त्व प्रस्तुत करता है।

समवाय को आन्तरिक सम्बन्ध कहना युक्तियुक्त नहीं है। आन्तरिक सम्बन्ध उस संबंध को कहते है जो सम्बन्धित वस्तुओं को स्वभाव का अंग रहता है। आन्तरिक सम्बन्ध में सम्बन्धित वस्तुओं को एक दूसरी से अलग करना असम्भव है। परन्तु समवाय में यह विशेषता नहीं पायी जाती है। उदाहरणस्वरुप गुण द्रव्य के बिना नहीं रह सकता है, परन्तु द्रव्य गुण के बिना रह सकता है। कर्म द्रव्य के बिना नहीं रहता है। परन्तु द्रव्य कर्म के बिना रह सकता है। व्यक्ति सामान्य से अलग नहीं रह सकता है, परन्तु सामान्य व्यक्ति से अलग रह सकता है। अतः समवाय सम्बन्ध में दोनों सम्बन्धित चीजें एक दूसरी पर आश्रित नहीं है। इसीलिये प्रो० हरियन्त्रा ने समवाय सम्बन्ध को बाह्य-सम्बन्ध कहा है।

वैशेषिक दर्शन में समवाय की स्वतंत्रता का तर्क

वैशेषिक-दर्शन में समवाय को एक स्वतन्त्र पदार्थ माना गया है। वैशेषिक का तर्क है कि यदि द्रव्य वास्तविक है, और गुण वास्तविक है तो दोनों का सम्बन्ध समवाय भी वास्तविक ही है। यदि व्यक्ति और सामान्य दोनों वास्तविक हैं तब व्यक्ति और सामान्य का सम्बन्ध-समवाय-भी वास्तविक है। अतः समवाय को एक स्वतंत्र पदार्थ मानना न्याय-संगत है। समवाय को इसलिये भी स्वतन्त्र पदार्थ माना गया है कि इसे अन्य पदार्थ के अन्दर नहीं लाया जा सकता। सामान्य और व्यक्ति के बीच के सम्बन्ध को समवाय कहा जाता है। इसे द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष या अभाव के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता है । अतः समवाय को एक स्वतंत्न पदार्थ मानना आवश्यक है।

निष्कर्ष:- वैशेषिक दर्शन में विशेष और समवाय का सार

वैशेषिक दर्शन में 'विशेष' और 'समवाय' केवल दार्शनिक अवधारणाएँ नहीं हैं, बल्कि ये इस बात का ठोस प्रमाण हैं कि यह दर्शन दुनिया की हर छोटी से छोटी चीज़ को कितनी वैज्ञानिक और सूक्ष्म दृष्टि से देखता है।

जहाँ 'विशेष' नित्य द्रव्यों और परमाणुओं को उनकी अपनी एक अनूठी और स्वतंत्र पहचान (Uniqueness) देता है, वहीं 'समवाय' वह नित्य और अटूट धागा है जो दो अयुतसिद्ध पदार्थों को आपस में जोड़कर (Unity) इस पूरी सृष्टि की रचना को संभव बनाता है।

एक ओर विशेष वस्तुओं को एक-दूसरे से अलग करता है, तो दूसरी ओर समवाय उन्हें आपस में जोड़ता है। विभेदीकरण और एकीकरण की इसी अद्भुत दार्शनिक व्याख्या के कारण वैशेषिक दर्शन में विशेष और समवाय दोनों को स्वतंत्र पदार्थ का दर्जा दिया गया है। इन दोनों पदार्थों की गहन समझ के बिना भारतीय दर्शन की समृद्ध विश्लेषणात्मक परंपरा को अधूरा ही माना जाएगा।

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FAQ – विशेष और समवाय

1. वैशेषिक दर्शन में विशेष क्या है?

उत्तर:-विशेष वैशेषिक दर्शन का एक पदार्थ है। यह नित्य और अलग-अलग वस्तुओं की विशिष्टता को बताता है, जिसके कारण एक नित्य वस्तु दूसरी नित्य वस्तु से अलग मानी जाती है।

2. वैशेषिक दर्शन में समवाय क्या है?

उत्तर:-समवाय एक विशेष प्रकार का नित्य संबंध है, जिसमें दो वस्तुओं का ऐसा संबंध होता है कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करके उसी रूप में समझना संभव नहीं होता।।

3. विशेष और समवाय में क्या अंतर है?

उत्तर:-विशेष किसी नित्य वस्तु की विशिष्टता को बताता है, जबकि समवाय दो संबंधित पदार्थों के बीच मौजूद नित्य संबंध को बताता है।।

4. विशेष किस प्रकार का पदार्थ है?

उत्तर:-विशेष वैशेषिक दर्शन में माने गए पदार्थों में से एक है। इसे नित्य द्रव्यों की पारस्परिक भिन्नता का कारण माना जाता है।।

5. समवाय संबंध का उदाहरण क्या है?

उत्तर:-वस्त्र और उसके धागों का संबंध समवाय का उदाहरण माना जा सकता है। धागा के बिना उसी वस्त्र का अस्तित्व नहीं माना जाता।।

6. वैशेषिक दर्शन में कितने पदार्थ माने गए हैं?

उत्तर:-प्राचीन वैशेषिक दर्शन में छह पदार्थ माने गए थे—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। बाद में अभाव को भी पदार्थ के रूप में स्वीकार किया गया।।

7. क्या विशेष और समवाय दोनों पदार्थ हैं?

उत्तर:-हाँ। विशेष और समवाय दोनों वैशेषिक दर्शन के पदार्थों में शामिल हैं।।

8. समवाय को नित्य संबंध क्यों कहा जाता है?

उत्तर:-क्योंकि समवाय संबंध को उन दो तत्वों के अस्तित्व के साथ अविभाज्य माना जाता है जिनके बीच यह संबंध होता है। यह सामान्य संयोग की तरह अलग होकर समाप्त होने वाला संबंध नहीं माना जाता।।

9.समवाय का सिद्धांत क्या है?

उत्तर:-समवाय का सिद्धांत वैशेषिक दर्शन में अविभाज्य और नित्य संबंध को समझाता है। इसके अनुसार दो ऐसी वस्तुओं के बीच संबंध होता है, जिन्हें उस संबंध से अलग करके उसी रूप में नहीं समझा जा सकता। जैसे वस्त्र और उसके धागे, या द्रव्य और उसके गुण के बीच समवाय संबंध माना जाता है।।

10.समवाय का क्या अर्थ है?

उत्तर:-‘समवाय’ का सामान्य अर्थ है एक साथ रहना या अविभाज्य रूप से जुड़े होना। वैशेषिक दर्शन में समवाय एक नित्य संबंध है, जिसके द्वारा दो अविभाज्य रूप से संबंधित तत्व एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।।

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