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वैशेषिक दर्शन में द्रव्य (Dravya) क्या है परिभाषा, 9 द्रव्य, प्रकार,

वैशेषिक दर्शन में संपूर्ण ब्रह्मांड के तत्वों को समझने के लिए 7 पदार्थों (Padarthas) की विवेचना की गई है। इन सात पदार्थों में सबसे पहला पदार्थ 'द्रव्य' (Dravya) है। सरल शब्दों में कहें तो द्रव्य वह सत्ता है जिसमें गुण (Qualities) और कर्म (Actions) विद्यमान रहते हैं और जो सृष्टि का समवायी कारण (Inherent Cause) है। यदि आप भारतीय दर्शन में 'द्रव्य क्या है?', इसकी सटीक परिभाषा और इसके भेदों को विस्तार से समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है। आज के इस विस्तृत लेख में हम वैशेषिक दर्शन के अनुसार द्रव्य के स्वरूप और इसके 9 भेदों (9 Dravyas) की गहराई से चर्चा करेंगे।

द्रव्य क्या है

द्रव्य वैशेषिक दर्शन का प्रथम पदार्थ है। वैशेषिक दर्शन के संस्थापक महर्षि कणादअपने ग्रथों में 7 पदार्थों का वर्णन किया है। जिसमें द्रव्य पहला एवं महत्वपूर्ण पदार्थ है। द्रव्य वह आधार है "जिसमें गुण और कर्म मौजूद हो" वैशेषिक दर्शन के अनुसार संसार की सभी वस्तुएँ किसी न किसी द्रव्य पर आधारित है। इसलिए वस्तुओं के स्वरूप और उसके गुणों को समझने के लिए द्रव्य का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। बिना द्रव्य के गुण और कर्म का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हो सकता।
वैशेषिक दर्शन में द्रव्य (Dravya) क्या है  परिभाषा, 9 द्रव्य, प्रकार,

द्रव्य की परिभाषा

"क्रिया - गुणवत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम्"

द्रव्य, गुण और कर्म का अधिष्ठान (Substratum) है और अपने कार्यों का उपादानकारण है। द्रव्य गुण और कर्म का आधार है। द्रव्य के बिना गुण और कर्म की कल्पना नहीं की जा सकती। गुण और कर्म द्रव्य में ही समवेत होते हैं। उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं सोचा जा सकता। जिस सत्ता में गुण और कर्म समवेत रहते हैं उसके आधार को ही द्रव्य कहा जाता है।
यद्यपि गुण और कर्म द्रव्य में समवेत रहते हैं, फिर भी गुण और कर्म द्रव्य से अलग माने जाते हैं। गुण और कर्म गुणों से हीन हैं। उन्हें गुणवान् नहीं कहा जा सकता । द्रव्य इसके विपरीत गुणों से युक्त हैं। इस प्रकार द्रव्य को गुणवान् कहना प्रमाण-संगत है। अतः द्रव्य, गुण या कर्म से भिन्न होते हुए भी उनका आधार है।
द्रव्य की परिभाषा से यह सूचित होता है कि द्रव्य, गुण और कर्म का आधार होने के अतिरिक्त अपने कार्यों का समवायि-कारण (material cause) है। सूत से कपड़ा निर्मित होता है। इसीलिये सूत को कपड़े का समवायि-कारण कहा जाता है। इसी प्रकार द्रव्य भी अपने कार्यों का उपादान कारण है।
द्रव्य में सामान्य निहित होता है। द्रव्य के सामान्य को 'द्रव्यत्व' कहा जाता है।

वैशेषिक दर्शन में द्रव्य नौ प्रकार के बतलाये गए हैं। वे ये हैं-

    -
  1. पृथ्वी (Earth)
  2. अग्नि (Fire)
  3. वायु (Air)
  4. जल (Water)
  5. आकाश (Ether)
  6. दिक् (Space)
  7. काल (Time)
  8. आत्मा (Self)
  9. मन (Mind)

इन द्रव्यों में से पहले के पाँच द्रव्य को पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को "पंचभूत" (Five Physical elements) कहा जाता है। प्रत्येक एक-एक का अपना विशिष्ट गुण है।

शाश्वत(नित्य ) :- जो कभी नष्ट न हो।
अशाश्वत(अनित्य) :- जिसका अंत निश्चित हो।

पृथ्वी (Earth)

पृथ्वी का विशेष गुण 'गन्ध' है। किसी भी दूसरी चीज़ में सुगंध या दुर्गंध तभी महसूस होती है, जब उसमें मिट्टी या पृथ्वी का कोई तत्व मिला हुआ हो। यही कारण है कि गन्दे पानी में जिसमें पृथ्वी का अंश शामिल है, उसमें महक होती है स्वछ जल में नहीं होती ।
पृथ्वी शाश्वत (सदा रहने वाला) और अशाश्वत है।
पृथ्वी के परमाणु शाश्वत है जबकि उससे बने हुए पदार्थ अनित्य (नाशवान) है।

जल (Water)

जल का विशेष गुण 'रस' है।
जल भी शाश्वत और अशाश्वत है। जल के परमाणु शाश्वत हैं और जल से निर्मित पदार्थ अशाश्वत है।

वायु (Air)

वायु का विशेष गुण 'स्पर्श' है।
वायु भी नित्य और अनित्य है । वायु के परमाणु नित्य हैं तथा उससे निर्मित वस्तुएँ अनित्य हैं।

अग्नि (Fire)

अग्नि का विशेष गुण 'रुप' है तथा आकाश का विशेष गुण 'शब्द' है।
अग्नि भी नित्य और अनित्य है । अग्नि के परमाणु नित्य हैं जबकि उससे बनी वस्तुएँ अनित्य है।

वैशेषिक का कहना है जिस भूत (पंचभूत) के विशेष गुण का ज्ञान जिस इन्द्रिय से होता है वह इन्द्रिय उसी भूत से निर्मित है।

वैशेषिक दर्शन में द्रव्य के दो प्रकार के होते हैं:-

  1. नित्य
  2. अनित्य।

पृथ्वी , जल, वायु और अग्नि के परमाणु नित्य हैं और उनसे बने कार्य द्रव्य अनित्य हैं।

परमाणु चार प्रकार के होते हैं -

  • पृथ्वी परमाणु
  • वायु परमाणु
  • जल परमाणु
  • अग्नि परमाणु

परमाणु को नित्य माना जाता है। परमाणु आँखों से दिखाई नहीं देते हैं। परमाणुओं का अस्तित्व अनुमान से प्रमाणित होता है ।
जब हम किसी कार्य द्रव्य (बनी हुई चीज़) का विभाजन करते हैं तब उनके विभिन्न अवयवों (हिस्सों) को एक दूसरे से अलग करते जाते हैं। यहाँ पर यह कहना आवश्यक न होगा कि कोई भी बनी हुई चीज़ (कार्य-द्रव्य) अलग-अलग हिस्सों से मिलकर बनी होती है, इसीलिए उसे टुकड़ों में बाँटा जा सकता है इस प्रकार जब कार्य द्रव्यों के विभिन्न हिस्से को अलग कर महत् से क्षुद्र की और जाते हैं तो इस प्रकार चलते-चलते अन्त में एक ऐसी अवस्था पर आते हैं जिसका विभाजन सम्भव नहीं होता है। ऐसे अविभाज्य कणों को 'परमाणु' कहा जाता है। परमाणु निरवयव (Partless) होता है। परमाणु का निर्माण और नाश असम्भव है।

निर्माण का अर्थ है "विभित्र अंशों का संयुक्त होना।" पर परमाणु अवयवहीन है। इसलिए उसका निर्माण सम्भव नहीं है। परमाणु का नाश भी सम्भव नहीं है, क्योंकि नाश का अर्थ है "विभिन्न अवयवों का बिखर जाना।" परमाणु निरवयव होने के कारण अविनाशी है। यही कारण है कि वैशेषिक ने परमाणु को नित्य माना है।

वैशेषिक दर्शन के परमाणु विचार और पाश्चात्य दर्शन के परमाणु-विचार में अंतर बतलाया गया है। वैशेषिक दर्शन के संस्थापक महर्षि कणाद है। और पाश्चात्य दर्शन के संस्थापक डिमोक्रीटस कहे जाते हैं। दोनों के परमाणु सिध्दांत में भेद में बतलाये जाते है।

वैशेषिक और डिमोक्रीटस के परमाणु सिध्दांत में अंतर

वैशेषिक दर्शन के परमाणु विचार डिमोक्रीटस का परमाणु विचार
परमाणुओं के बीच गुणात्मक भेद को भी माना गया है। परमाणओं में सिर्फ परिणाम को लेकर भेद है। गुण की दृष्टि से सभी परमाणु बराबर हैं।
परमाणुओं को स्वभावतः गतिहीन माना है। परमाणु स्वभावतः क्रियाशील हैं
परमाणुओं में गति बाहरी दबाव के कारण ही प्रतिफलित होती है। गति परमाणुओं का स्वभाव है।
यह भी पढ़ें:न्याय दर्शन में प्रमा और अप्रमा क्या हैं?

आकाश (Ether)

चार भौतिक द्रव्यों की चर्चा हो जाने के बाद अब पाँचवें भौतिक द्रव्य 'आकाश' की चर्चा करेंगे। आकाश परमाणुओं से रहित है। आकाश का प्रत्यक्षीकरण नहीं होता है, बल्कि इसके गुणों को देखकर इसका अनुमान किया जाता है। प्रत्येक गुण का आधार अवश्य होता है। हमें शब्द सुनाई पड़ता है।
अब प्रश्न यह है कि शब्द किस द्रव्य का गुण है। शब्द पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि का गुण नहीं हो सकता है, क्योंकि इन द्रव्यों के विशेष गुण क्रमशः गन्ध, रस, स्पर्श और रुप हैं। शब्द दिक्, काल या मन का विशेष गुण नहीं है, क्योंकि इन द्रव्यों का कोई विशेष गुण नहीं होता। शब्द आत्मा का विशेष गुण नहीं कहा जा सकता। अतः शब्द आकाश का ही गुण है। इस प्रकार आकाश को शब्द गुण का आधार माना जाता है। यह सर्वव्यापी और नित्य है। आकाश निरवयव है। निरवयव होने के कारण यह उत्पादन और विनाश से परे है। एक होने के कारण यह सामान्य से रहित है।

दिक् और काल (Space and Time)

सभी भौतिक द्रव्यों का अस्तित्व 'दिक् 'और' काल' में होता है। दिक् और काल के बिना भौतिक द्रव्यों की व्याख्या असम्भव हो जाती है। इसीलिये वैशेषिक ने दिक् और काल को द्रव्य के रूप में माना है।

दिक् (दिशा)

दिक संसार की वस्तुओं को आश्रय प्रदान करता है। यदि दिक् न होता तो संसार की विधि 'पूर्व' और 'पश्चिम', 'निकट' और 'दूर', 'यहाँ' और 'वहाँ' इत्यादि प्रत्ययों का आधार दिक् है। दिक वस्तुएँ एक दूसरे के अन्दर प्रविष्ट हो जाती। दिक अदृश्य है । इसका ज्ञान अनुमान के द्वारा होता है अर्थ-व्यापक, नित्य और विशेष गुण से हीन है। यद्यपि दिक एक है फिर भी दैनिक जीवन में एक स्थान' और 'दूसरे स्थान' 'पूर्व' और 'पश्चिम' दिक के औपाधिक भेद हैं। दिक् आकाश से भिन्न है। आकाश भौतिक द्रव्य है, जबकि दिक् भौतिक द्रव्य नहीं है।

काल (Time)

'काल' भी 'दिक' की तरह नित्य और सर्वव्यापी है। काल सभी परिवर्तनों का साधारण कारण है। काल का प्रत्यक्षीकरण नहीं होता है। यह अनुमान का विषय है। 'प्राचीन' और 'नवीन':' भूत', 'वर्तमान' और 'भविष्य' 'पहले' और 'बाद' इत्यादि प्रत्ययों का आधार काल है। यद्यपि काल एक है फिर भी उपाधि-भेद के कारण काल अनेक दिखाई पडता है। क्षण, दिन, मास, मिनट, वर्ष इत्यादि काल के भेदों का कारण उपाधि है। 'दिक् "काल' से भित्र है। इसका कारण यह है कि दिक् का विस्तार होता है जबकि काल विस्तारहीन है।

मन (Mind)

मन को वैशेषिक ने अन्तरिन्द्रिय (internal sense organ) माना है। मन अदृश्य है। इसका ज्ञान अनुमान के सहारे होता है। वैशेषिक दर्शन में मन को सिद्ध करने के लिये दो तर्क दिये गये हैं-

  1. जिस प्रकार बाह्य वस्तुओं के ज्ञान के लिये बाह्य इन्द्रियों की सत्ता माननी पड़ती है उसी प्रकार आत्मा, सुख-दुःख आदि आन्तरिक व्यापारों को जानने के लिये एक आन्तरिक इन्द्रिय को आवश्यकता है। वही आन्तरिक इन्द्रिय 'मन' है।
  2. ऐसा देखा जाता है कि पाँचों बाह्येद्रियों के अपने विषयों के साथ संयुक्त रहने पर भी हमें रुप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श की अनुभूति नहीं होती है। इससे सिद्ध होता है कि बाह्य इन्द्रियों के अतिरिक्त एक आन्तरिक इन्द्रिय का सहयोग भी ज्ञान के लिए आवश्यक है। वही इन्द्रिय 'मन' है।

वैशेषिक-दर्शन में मन-सम्बन्धी विचार की कुछ विशिष्टतायें हैं जिनकी ओर ध्यान देना आवश्यक है। मन को अणुरुप (atomic) माना गया है। मन निरवयव है। अतः एक समय एक ही प्रकार की अनुभूति सम्भव है, क्योंकि उस अनुभूति को अपनाने वाला मन अविभाज्य है।
मन को वैशेषिक ने नित्य माना है। यह नित्य इसलिये है कि यह अवयवहीन है। विनाश और निर्माण का अर्थ क्रमशः विभिन्न अवयवों का पृथक्करण और संयोजन है।
मन, आकाश, काल, दिक् आदि से भिन्न है। इस भित्रता का कारण यह है कि मन सक्रिय है जबकि आकाश, काल, दिक् इत्यादि निष्क्रिय हैं।

आत्मा (Soul)

वैशेषिक-दर्शन में आत्मा उस सत्ता को कहा गया है जो चैतन्य का आधार है। इसीलिये कहा गया है कि आत्मा वह द्रव्य है जो ज्ञान का आधार है । (Soul is the substratum in which knowledge inheres) ।

वैशेषिक ने दो प्रकार की आत्माओं को माना है:-

  1. जीवात्मा (Individual soul)
  2. परमात्मा (Supreme soul)

जीवात्मा

जीवात्मा की चेतना सीमित है जबकि परमात्मा की चेतना असीमित है। जीवत्मा अनेक हैं जबकि परमात्मा एक है। परमात्मा ईश्वर का ही दूसरा नाम है। ईश्वर की व्याख्या करने से पूर्व हम जीवात्मा की जिसे "आत्मा" कहा जाता है इसकी व्याख्या करेंगे।
वैशेषिक के मतानुसार ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, धर्म, अधर्म इत्यादि आत्मा के विशेष गुण हैं। जीवात्मा अनेक हैं। जितने शरीर हैं, उतनी ही जीवात्मा होती हैं। प्रत्येक जीवात्मा में मन का निवास होता है, जिसके कारण इनकी विशिष्टता विद्यमान रहती है। आत्मा की अनेकता को वैशेषिक ने जीवात्माओं की अवस्थाओं में भित्रता के आधार पर सिद्ध किया है। कुछ जीवात्मा 'सुखी' हैं, कुछ 'दु:खी' है. कुछ 'धनवान' हैं, कुछ 'निर्धन' हैं। ये विभिन्न अवस्थाएँ अनेक आत्माओं को प्रस्तावित करता है।
वैशेषिक ने आत्मा को 'अमर' माना है। यह 'अनादि' और 'अनन्त' है। आत्मा की सत्ता को प्रमाणित करने के लिये वैशेषिक ने कुछ युक्तियों का उपयोग किया है।

आत्मा अमर है और इसके प्रमाण (सबूत):-

  1. प्रत्येक गुण का कुछ-न-कुछ आधार होता है। चैतन्य एक गुण है। इस गुण का आश्रय शरीर, मन और इन्द्रिय नहीं हो सकती। अतः इस गुण का आश्रय आत्मा है। चैतन्य आत्मा का स्वरुप गुण नहीं है, अपितु यह उसका आगन्तुक गुण है। आत्मा में चैतन्य का आविर्भाव तब होता है जब आत्मा का सम्पर्क शरीर, इन्द्रियों और मन से होता है। आत्मा की यह व्याख्या सांख्य योग की आत्मा की व्याख्या से भिन्न प्रतीत होती है। सांख्य योग के मतानुसार चैतन्य आत्मा का स्वरुप लक्षण है ।
  2. जिस प्रकार कुल्हाड़ी का व्यवहार करने के लिए एक व्यक्ति की आवश्यकता होती है उसी प्रकार आँख, कान, नाक आदि विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करने वाला भी कोई होना चाहिए। वही आत्मा है।
  3. प्रत्येक व्यक्ति को सुख-दुःख की अनुभूति होती है। इससे सिद्ध होता है कि सुख-दुःख किसी सत्ता के विशेष गुण हैं। सुख-दुःख पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, दिक् और काल के गुण नहीं हैं। अतः सुख-दुःख आत्मा ही के विशेष गुण हैं।
  4. नवजात शिशु जन्म के साथ-ही-साथ हँसता और रोता है। नवजात शिशु की ये अनुभूतियाँ सिद्ध करती हैं कि इस जीवन के पूर्व भी उसका अस्तित्व था। इससे आत्मा की सत्ता प्रमाणित होती है।

'परमात्मा'(ईश्वर) का स्वरूप और तर्क

परमात्मा को ईश्वर कहा जाता है। ईश्वर की चेतना असीमित है जबकि जीव की चेतना सीमित है। वह पूर्ण है। वह दयावान् है।

  • ईश्वर ने विश्व की "सृष्टि"(रचना) की है।
  • ईश्वर ने "वेद" की रचना की है।
  • ईश्वर जीवात्मा को उनके कर्मों के अनुरुप 'सुख-दुःख' प्रदान करता है। ईश्वर कर्म फलदाता है।
  • ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए वैशेषिक-दर्शन में युक्तियों (तर्कों) की व्याख्या हुई है।
  • विश्व को कार्य मानकर इसके कारण की व्याख्या के लिए ईश्वर की स्थापना हुई है।
  • ईश्वर के अस्तित्व को अदृष्ट नियम की व्याख्या के लिए भी माना गया है। ईश्वर अदृष्ट नियम का संचालक है।
  • वैशेषिक श्रुति के आधार पर जो प्रामाणिक ग्रन्थ हैं, ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करता है।

वैशेषिक का 'द्रव्य विचार' (वस्तुवाद और अनेकवाद)

वैशेषिक के द्रव्य-विचार को जान लेने के बाद हम यह पाते हैं कि वैशेषिक के द्रव्यों का वर्गीकरण भौतिकवादी (Materialistic) नहीं है, क्योंकि वह मिट्टी-पानी के (भौतिक द्रव्यों) के अतिरिक्त आत्मा की सत्ता में विश्वास करता है। वैशेषिक के द्रव्यों का वर्गीकरण अध्यात्मवादी (Idealistic) भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह बाहरी भौतिक दुनिया को झूठ या भ्रम नहीं मानता, बल्कि उसकी "भौतिक द्रव्यों" असली सत्ता को स्वीकार करता है।

वस्तुवाद

वैशेषिक का द्रव्य-विचार वस्तुवादी (Realistic) है। वस्तुवाद उस दार्शनिक सिद्धान्त को कहा जाता है "जो वस्तुओं का अस्तित्व ज्ञाता से स्वतन्त्र मानता है।" वैशेषिक का द्रव्य-वर्गीकरण वस्तुवादी कहा जाता है, क्योंकि वह द्रव्यों की सत्ता को ज्ञाता से स्वतन्त्र मानता है।

अनेकवाद

वैशेषिक का द्रव्य-विचार अनेकवाद का समर्थन करता है। वैशेषिक द्रव्यों की संख्या 'अनेक' मानता है। द्रव्य नौ प्रकार के होते हैं-पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, दिक, काल, आत्मा और मन। इसीलिये वैशेषिक के द्रव्य का वर्गीकरण अनेकवादी कहा जाता है।

वैशेषिक दर्शन:- FAQ

1.वैशेषिक दर्शन में 9 द्रव्य कौन से है?

उत्तर:- वैशेषिक दर्शन में कुल 9 द्रव्यों का वर्णन मिलता है:- पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल, आकाश, दिक् (दिशा), काल, आत्मा, और मन। इनमें से पहले के पांच द्रव्य (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल, आकाश ) को पंचभूत द्रव्य कहा जाता है।

2.वैशेषिक दर्शन के संस्थापक कौन है?

उत्तर:- वैशेषिक दर्शन के संस्थापक महर्षि कणाद है, इन्हें कणभक्ष, उलूक, और काश्यप नामों से जाना जाता है। महर्षि कणाद ने परमाणुवाद सिद्धांत दिया है।

3.द्रव्य का मतलब क्या होता है?

उत्तर:- द्रव्य का सामान्य अर्थ होता है जिसमे गुण और कर्म विद्यमान रहते है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार किसी भी वस्तु का अस्तित्व द्रव्य पर आधारित होता है। द्रव्य वैशेषिक दर्शन का पहला एवं महत्वपूर्ण पदार्थ है।

4.वैशेषिक दर्शन का पहला पदार्थ क्या है?

उत्तर:- वैशेषिक दर्शन का पहला पदार्थ द्रव्य है। द्रव्य वैशेषिक दर्शन का एक महत्वपूर्ण पदार्थ है। इसे सभी पदार्थों का आधार माना गया है, क्योंकि गुण और कर्म द्रव्य में ही स्थित रहते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी द्रव्य पर आधारित होती है। इसी कारण सात पदार्थों में द्रव्य को प्रथम स्थान दिया गया है।

5.द्रव्य कितने प्रकार के होते है?

उत्तर:- वैशेषिक दर्शन के अनुसार द्रव्य दो प्रकार के माने गए हैं- 1. नित्य द्रव्य - जिनका कभी नाश नहीं होता और जो हमेशा रहता है।
2. अनित्य द्रव्य - जो उत्पन्न होते है और समय के साथ नष्ट भी हो जाते है।
उदाहरण के लिए पृथ्वी, अग्नि, वायु, और जल के परमाणु नित्य है, जबकि इनसे बनी सभी वस्तुएं अनित्य माने गए है।

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