वैशेषिक दर्शन में गुण (Quality) क्या है
'गुण' वैशेषिक दर्शन का दूसरा पदार्थ है। गुण 'द्रव्य'में निवास करता है। इसलिये गुण को अकेला नहीं पाया जा सकता। गुण का दूसरा लक्षण यह है कि यह 'गुण' से शून्य है—अर्थात द्रव्य का गुण होता है, परन्तु गुण का कोई गुण नहीं होता है। यदि गुण का गुण खोजा जाय, तो निराशा होगी।
गुण कर्म से भी शून्य है। गुण में गति का अभाव होता है। गुण द्रव्य का वह रुप है जो निष्क्रिय (गतिहीन) है। गुण संयोग और विभाग (वियोग) का साक्षात् कारण नहीं होता है। (कलम और हाथ के सम्पर्क होने से जो सम्बन्ध होता है उसे संयोग कहते हैं।) संयोग का अन्त विभाग (वियोग) से होता है। गुण निष्क्रिय होने के कारण संयोग और विभाग का कारण नहीं है।
गुण, गौण रुप से वस्तु (द्रव्य) में रहकर सहायक होता है। इसलिये गुण को असमवायी कारण(non-material cause) कहा जाता है। असमवायी कारण का सुंदर उदाहरण सूत (धागे) का रंग है, जो सूत में संयुक्त होकर उससे निर्मित होने वाले 'वस्त्र' के रूप और स्वरूप को निर्धारित करता है।
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गुण की परिभाषा
गुण वह है-
- जो द्रव्य में समवेत है,
- जो गुण से शून्य है,
- जो कर्म से शून्य है,
- जो संयोग और विभाग का साक्षात् कारण नहीं है
- जो अपने कार्य का असमवायी कारण है ।
गुण 'कर्म' से भिन्न है। कर्म द्रव्य का 'सक्रिय' रुप है जबकि गुण द्रव्य का 'निष्क्रिय' रुप है। गुण द्रव्य से भी भिन्न है। द्रव्य अपनी सत्ता के लिए पूर्णतः स्वतन्त्र है। द्रव्य का अस्तित्व अपने आप होता है। परन्तु गुण द्रव्याश्रित है। इस प्रकार गुण स्वतन्त्र न होकर निर्भर है। यहाँ पर यह पूछा जा सकता है कि जब गुण अपने अस्तित्व के लिए स्वतन्त्र नहीं है, तब उसे स्वतन्त्र पदार्थ क्यों माना जाता है? इसके उत्तर में हम कह सकते हैं कि पदार्थ उसे कहा जाता है 'जिसका नामकरण हो सके', जो ज्ञेय है। चूँकि गुण का नामकरण होता है, उसका विचार किया जा सकता है, इसलिये उसे स्वतंत्र पदार्थ माना गया है। अतः गुण को स्वतन्त्र पदार्थ की कोटि में रखना न्याय-संगत है।
वैशेषिक दर्शन के कितने गुण है
वैशेषिक-दर्शन में चौबीस प्रकार के गुण माने जाते हैं। कुछ लोगों का मत है कि कणाद ने 17 गुणों को ही माना है। परन्तु जैसे-जैसे दर्शन का विकास होता गया, इसमें और 'सात' गुण जोड़ दिये जाते हैं। ये सात गुण प्रशस्तपाद के द्वारा संग्रहीत किये गये हैं।वैशेषिक दर्शन के 24 गुण
- रुप (Colour),
- स्वाद (Taste),
- स्पर्श (Touch),
- गन्ध (Smell),
- शब्द (Sound),
- संयोग (Conjunction),
- विभाग (Disjunction),
- दूरत्व (Remoteness),
- अपरत्व (Nearness),
- पृथकत्व (Distinctness),
- परिमाण, (Magnitude),
- बुद्धि (Cognition),
- सुख (Pleasure),
- दुःख (Pain),
- इच्छा (Desire),
- द्वेष (Aversion),
- प्रयत्न (Effort),
- गुरुत्व (Heaviness),
- द्रवत्व (Fluidity),
- स्नेह (Viscidity),
- संस्कार (Faculty),
- संख्या (Number),
- धर्म (Merit),
- अधर्म (Demerit)
भौतिक और मानसिक गुणों
ऊपर वर्णित चौबीस गुणों में कुछ भौतिक तथा कुछ मानसिक गुण संग्रहीत हैं।
भौतिक गुण
रुप, गन्ध, स्वाद, स्पर्श, शब्द ये गुण भौतिक कहे जाते हैं।ये पंचमहाभूतों के विशेष गुण हैं:-
- अग्नि:-रुप
- पृथ्वी:-गन्ध
- जल:-स्वाद
- वायु:-स्पर्श
- आकाश:-शब्द
मानसिक गुण
इनके अतिरिक्त सुख-दुःख, बुद्धि, इच्छा, द्वेष आदि मानसिक गुण हैं।
अब हम वैशेषिक के चौबीस गुणों का विवेचन एक-एक कर करेंगे।
रुप
रुप एक विशेष गुण है जिसका प्रत्यक्ष सिर्फ चक्षु (visual organ) से होता है। इसका निवास स्थान पृथ्वी, जल, और तेजस् (Light) है। श्वेत (White), नील (blue), रक्त (red), पीत (yellow), हरित (green) आदि विभित्र प्रकार के रुप होते हैं।
स्वाद
स्वाद एक विशेष गुण है। इसका प्रत्यक्ष रसना (gustatory organ) से ही होता है।
रस छः प्रकार का होता है-
- मधुर
- कटु
- तीता
- कषाय
- लवण
- नमकीन ।
स्पर्श
स्पर्श एक विशेष गुण है। इसका प्रत्यक्ष केवल त्वचा (tactual organ) से होता है।
स्पर्श तीन प्रकार का होता है-
- शीत (cold)
- उष्ण (hot)
- अशीतोष्ण (neither cold nor hot)।
गन्ध
गन्ध भी एक विशेष गुण है। इसका प्रत्यक्ष केवल 'नासिका' (olfactory organ) के द्वारा होता है। इसका निवास स्थान पृथ्वी है।
गन्ध दो प्रकार का होता है-
- सुगन्ध
- दुर्गन्ध।
गन्ध अनित्य गुण है।
शब्द
शब्द भी रुप, रस, गन्ध, स्पर्श की तरह एक विशेष गुण है। इसका प्रत्यक्ष ज्ञान सिर्फ 'कान' (auditory organ) से ही होता है।
संयोग:-
दो पृथक् रहने वाले द्रव्यों के मिलने से जो सम्बन्ध होता है उसे 'संयोग' कहा जाता है, जैसे हाथ का कलम के साथ।
संयोग तीन प्रकार का होता है-
- अन्यतर कर्मज-यह संयोग 'दो द्रव्यों' में से 'एक द्रव्य' की गति(क्रिया) के कारण उत्पन्न होता है। चिड़िया का उड़कर पहाड़ पर बैठ जाने से होने वाला संयोग इसका उदाहरण कहा जा सकता है।
- उभय कर्मज-यह संयोग 'दोनों द्रव्यों' की गति के कारण होता है। दंगल में दो पहलवानों के संयोग इसका उदाहरण कहा जा सकता है।
- संयोगज संयोग-जब एक संयोग से दूसरा संयोग हो जाता है तो उस संयोग को 'संयोगज संयोग' कहते हैं। उदाहरणस्वरुप हमारे हाथ में जो कलम है उससे टेबुल का संयोग हो तो हमारे हाथ का टेबुल के साथ जो सम्बन्ध हो जाता है वह 'संयोगज संयोग' कहा जाता है।
विभाग
विभाग संयोग का विपरीत है। यह दो संयुक्त द्रव्यों का अलग हो जाना कहा जाता है। चिड़िया के उड़ जाने से उसका पहाड़ से जो सम्बन्ध विछेद होता है उसे 'विभाग' कहा जाता है। विभाग 'भी संयोग की तरह तीन प्रकार का होता है।
विभाग के तीन प्रकार-
- कभी कभी विभक्त द्रव्यों में एक की गति के कारण विभाग होता है।
- कभी-कभी दोनों विभक्त द्रव्यों की गति के कारण विभाग होता है।
- कभी-कभी एक विभाग से दूसरा विभाग हो जाता है।
दूरत्व
'दूरत्व' वह गुण है जो वस्तु या व्यक्ति में 'दूर' होने के प्रत्यय (अनुभूति/ज्ञान) का आधार बनता है।
दूरत्व दो प्रकार का होता है:-
- दैशिक दूरत्व (स्थान के आधार पर): जब कोई वस्तु किसी निश्चित स्थान या देखने वाले से दूर स्थित होती है, तो उसमें दैशिक दूरत्व गुण होता है। (उदाहरण: पटना में रहने वाले व्यक्ति के लिए दिल्ली दूर है।)
- कालिक दूरत्व (समय/आयु के आधार पर): जब कोई व्यक्ति या घटना समय की दृष्टि से पहले की होती है, तो उसमें कालिक दूरत्व (ज्येष्ठता) माना जाता है। (उदाहरण: उम्र में बड़े व्यक्ति या पिता/दादा जी कालिक दृष्टि से दूरत्व रखते हैं।)
अपरत्व
'अपरत्व' वह गुण है जो वस्तु या व्यक्ति में 'निकट' (समीप) होने के प्रत्यय (अनुभूति/ज्ञान) का आधार बनता है।
अपरत्व भी दो प्रकार का होता है:
- दैशिक अपरत्व (स्थान के आधार पर): जब कोई वस्तु किसी स्थान या देखने वाले के पास/समीप स्थित होती है, तो उसमें दैशिक अपरत्व गुण होता है। (उदाहरण: हमारे सामने रखी हुई किताब या टेबल।)
- कालिक अपरत्व (समय/आयु के आधार पर): जब कोई व्यक्ति या घटना समय की दृष्टि से बाद की (नवीन) होती है, तो उसमें कालिक अपरत्व (कनिष्ठता) माना जाता है। (उदाहरण: उम्र में छोटा भाई या बालक।)
पृथकत्व
किसी द्रव्य का वह गुण जिससे वह द्रव्यों से अलग पहिचाना जाता है 'पृथकत्व' कहलाता है। पृथकत्व विशेष से भिन्न है।
परिणाम
परिणाम वह गुण है जिसके कारण 'बड़े' और 'छोटे' का भेद दिखाई पड़ता है।
परिणाम चार प्रकार का होता है-
- अणुत्व
- महत्व
- लम्बाई
- ओछापन
बुद्धि
वस्तुओं की चेतना को बुद्धि (ज्ञान) कहा गया है। ईश्वर में बुद्धि 'नित्य' है। जीवात्माओं में बुद्धि 'अनित्य' है।
सुख
अनुकूल वेदना को 'सुख' कहा जाता है।
दुःख
प्रतिकूल वेदना को 'दुःख' कहा गया है।
इच्छा
किसी वस्तु के प्रति अनुराग को 'इच्छा' कहते हैं
द्वेष
किसी वस्तु के प्रति विरक्ति को 'द्वेष' कहते हैं।
प्रयत्न
आत्मा की चेष्टा को 'प्रयत्न' कहा गया है।
प्रयत्न तीन प्रकार का होता है-
- प्रवृत्ति अर्थात किसी वस्तु को पाने का प्रयत्न
- निवृत्ति अर्थात् किसी वस्तु से बचने का प्रयत्न
- जीवन योनि प्रयत्न-अर्थात् प्राणधारणा की क्रिया, जैसे सांस लेना आदि।
गुरुत्व
वस्तुओं का वह गुण जिसके कारण वे नीचे की ओर गिरती हैं 'गुरुत्व' कहा जाता है।
द्रवत्व
'द्रवत्व' बहने का कारण है। यह स्वाभाविक रुप से जल और दूध में पाया जाता है।
स्नेह
स्नेह का अर्थ 'चिकनापन' है। इसके कारण द्रव्यों के कणों का परस्पर संश्लिष्ट हो जाना संभव होता है। यह गुण केवल जलमें पाया जाता है।
संस्कार
संस्कार वह गुण है जो किसी वस्तु में हुई गति या आत्मा में हुए पूर्व अनुभव के प्रभाव को बनाए रखकर नई क्रिया या स्मृति को उत्पन्न करता है।
संस्कार तीन प्रकार के माने गये हैं:-
- वेग-यह गति का कारण है। इसके कारण वस्तुयें गतिमान होती हैं।
- भावना-इसके कारण किसी विषय की स्मृति होती है।
- स्थिति स्थापकत्व-इसके कारण चीजें छेड़ी जाने पर अपनी आरम्भिक अवस्था में वापस आ जाती हैं।
संख्या
संख्या एक साधारण गुण है। इसके कारण एक, दो, तीन जैसे शब्दों का व्यवहार किया जाता है।
धर्म
धर्म से पुण्य का बोध होता है। विहित कर्मों को करने से 'धर्म' की प्राप्ति होती है। धर्म सुख के विशेष कारण हैं। जीवात्मा धर्म के कारण सुख का भोग करती है।
अधर्म
'अधर्म' से पाप का बोध होता है। निषिद्ध कर्मों को करने से 'अधर्म' की प्राप्ति होती है। अधर्म दुःख के विशेष कारण हैं। अधर्म के कारण दुःख का भोग करती है।
वैशेषिक के गुणों के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठता है कि वैशेषिक ने गुणों की संख्या चौबीस क्यों मानी ? गुणों की संख्या इससे कम या अधिक क्यों नहीं मानी गयी। इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि वैशेषिक के गुणों का वर्गीकरण सरलता के सिद्धान्त पर आधारित है। जो गुण सरल तथा मौलिक हैं उन्हीं की चर्चा इन चौबीस गुणों के अन्दर की गई है। इन चौबीस गुणों में से अधिकांश गुणों का उप-विभाजन होता है। उदाहरण-स्वरुप विभिन्न प्रकार के रंग-यथा लाल, पीला, उजला, इत्यादि-हैं। यदि इन प्रभेदों को गुण के अन्दर रखा जाय तो उसकी संख्या असंख्य होगी। इन चौबीस गुणों की व्याख्या में वे ही गुण आये हैं जो निष्क्रिय तथा मौलिक हैं। अतः गुणों को चौबीस मानना एक निश्चित दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है।FAQ:-
1.वैशेषिक दर्शन के अनुसार जीव के कितने गुण हैं?
उत्तर:- वैशेषिक दर्शन में जीवात्मा के 14 विशेष गुण माने जाते हैं। ये गुण हैं—बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग।
2.वैशेषिक दर्शन में गुण क्या है?
उत्तर:- वैशेषिक दर्शन में गुण उस विशेषता को कहा जाता है, जो किसी द्रव्य में रहकर उसकी पहचान और विशेषता को प्रकट करती है। गुण का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, बल्कि वह हमेशा किसी द्रव्य पर निर्भर रहता है। उदाहरण के लिए, पृथ्वी में गंध, जल में रस और अग्नि में रूप पाया जाता है। इस प्रकार गुण द्रव्य से अलग होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता। वैशेषिक दर्शन में कुल 24 गुणों को स्वीकार किया गया है।
3.वैशेषिक दर्शन का दूसरा गुण कौन-सा है?
उत्तर:- वैशेषिक दर्शन में रूप (रंग) के बाद दूसरा गुण रस (स्वाद) माना जाता है। रस का ज्ञान रसना इन्द्रिय यानी जीभ के माध्यम से होता है। मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय रस के प्रमुख प्रकार माने जाते हैं। सरल शब्दों में, किसी पदार्थ के स्वाद का अनुभव कराने वाली विशेषता को रस कहा जाता है।
4.वैशेषिक के 24 गुण कौन से हैं?
उत्तर :- वैशेषिक दर्शन के २४ गुण ये हैं - रुप, स्वाद ,स्पर्श, गन्ध, शब्द, संयोग, विभाग , दूरत्व, अपरत्व , पृथकत्व , परिमाण, बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा, द्वेष, प्रयत्न , गुरुत्व ,द्रवत्व ,स्नेह ,संस्कार,संख्या ,धर्म ,अधर्म है।
5.वैशेषिक दर्शन का दूसरा पदार्थ क्या है?
उत्तर:-वैशेषिक दर्शन का दूसरा पदार्थ गुण है। महर्षि कणाद जो वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक माने जाते है। उन्होंने 8 पदार्थ बतलाये है जिसमें से गुण 2 एवं महत्वपूर्ण पदार्थ है।
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