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वैशेषिक दर्शन के अनुसार कर्म क्या है

वैशेषिक दर्शन में कर्म (Action) क्या है

कर्म का आधार द्रव्य है। कर्म मूर्त्त द्रव्यों का गतिशील व्यापार है।

मूर्त द्रव्य पाँच हैं-

  1. पृथ्वी
  2. जल
  3. वायु
  4. अग्नि
  5. मन

कर्म का निवास इन्हीं द्रव्यों में होता है। कर्म का निवास सर्वव्यापी द्रव्यों में नहीं होता है, क्योंकि वे स्थान-परिवर्तन से शून्य हैं। कर्म द्रव्य का सक्रिय रुप है।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार कर्म क्या है

द्रव्य की दो विशेषतायें हैं-

  1. सक्रियता
  2. निष्क्रियता

कर्म द्रव्य का 'सक्रिय' रुप है जबकि गुण द्रव्य का 'निष्क्रिय' रुप है। कर्म निर्गुण है, गुण 'द्रव्य' में ही निर्भर रहता है, कर्म में नहीं। कर्म के द्वारा एक द्रव्य का दूसरे द्रव्यों से संयोग भी होता है। कर्म को इसीलिये संयोग और विभाग का साक्षात् कारण माना जाता है। गेंद को ऊपर फेंके जाने पर छत से संयुक्त होना कर्म के गति के द्वारा ही होता है।

कर्म की परिभाषा है-

  • द्रव्य में समवेत है,
  • जो गुण से शून्य है,
  • जो संयोग और विभाग का साक्षात् कारण है।

कर्म गुण से भित्र है।

गुण और कर्म में अंतर

क्रम गुण कर्म
1 गुण निष्क्रिय है। कर्म सक्रिय है।
2 गुण स्थाई होता है। कर्म क्षणिक होता है।
3 गुण संयोग और विभाग का कारण नहीं होता है। कर्म संयोग और विभाग का कारण है।

कर्म और गुण का द्रव्य पर आश्रित होना

  • गुण और कर्म दोनों 'द्रव्य' में ही निवास करते हैं।
  • कर्म और गुण की कल्पना द्रव्य के बिना नहीं की जा सकती।
  • 'कर्म' द्रव्य से भिन्न है।
  • द्रव्य की सत्ता के लिये किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, वह स्वतंत्र है।
  • इसके विपरीत कर्म 'परतंत्र' है। कर्म अपने आप खड़ा न होकर द्रव्य पर आश्रित(निर्भर) रहता है।

कर्म को पदार्थ क्यों माना गया है

कर्म को पदार्थ इसलिये कहा जाता है कि उसका नामकरण संभव है। जिस दृष्टिकोण से गुण को पदार्थ कहा जाता है, उसी दृष्टिकोण से कर्म को भी पदार्थ कहा जाता है।

कर्म की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं-

  1. पहली विशेषता कर्म की यह है कि कर्म क्षणिक होता है। यह कुछ ही काल तक जीवित रहता है। गेंद को छत से नीचे की ओर फेंकने में 'कर्म' होता है, परन्तु यह कर्म चन्द क्षणों तक ही कायम रहता है। वैशेषिक ने तो यहाँ तक कहा है कि कर्म पाँच ही क्षण तक कायम रहते हैं। कर्म की यह विशेषता उसे गुण से भित्र बना देती है। गुण स्थायी होता है।
    उदाहरण:- गेंद का रंग, जो गुण है, स्थायी होता है। यह तब तक कायम रहता है जब तक गेंद की सत्ता बनी रहती है।
  2. कर्म की दूसरी विशेषता यह है कि यह सभी द्रव्यों में नहीं पाया जाता है।
    उदाहरण:- असीमित द्रव्य-जैसे आकाश, काल, आत्मा, मन-कर्म से रहित हैं। इन द्रव्यों का स्थान परिवर्तन नहीं हो सकता है। वे एक स्थान से दूसरे स्थान में गतिशील नहीं हो सकते हैं। यही कारण है कि इन द्रव्यों में कर्म का अभाव है। कर्म केवल सीमित द्रव्य में ही होता है।
  3. कर्म की तीसरी विशेषता यह है कि कर्म से निश्चित द्रव्यों का निर्माण असम्भव है। परन्तु गुण में यह खूबी पायी जाती है।
    उदाहरण:- भिन्न-भिन्न अंशों के संयोग से मिश्रित द्रव्य का निर्माण सम्भव है। संयोग गुण है।
  4. कर्म की चौथी विशेषता यह है कि कर्म गुण से शून्य है। यह निर्गुण है। कर्म द्रव्य का गतिशील रुप है और गुण द्रव्य का निष्क्रिय रुप। गति को इसलिये गुण कहना कि यह तेज या धीमी होती है, अमान्य है। धीमा या तेज होना कर्म का लक्षण है, गुण का नहीं।

प्रशस्तपाद वैशेषिक दर्शन के बहुत ही प्रसिद्ध और महान आचार्य (दार्शनिक) का नाम है। वैशेषिक दर्शन के मूल संस्थापक महर्षि कणाद थे, जिन्होंने 'वैशेषिक सूत्र' लिखा था। महर्षिकणाद के बाद आचार्य प्रशस्तपाद ने उस ग्रंथ पर एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण टीका (ग्रंथ) लिखा, जिसका नाम है 'पदार्थधर्मसंग्रह' इसे प्रायः 'प्रशस्तपादभाष्य' भी कहा जाता है।
आचार्य प्रशस्तपाद के अनुसार, किसी भी वस्तु में गति (कर्म) अपने आप नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कुछ मुख्य कारण होते हैं

प्रशस्तपाद ने कर्म का होना कुछ उपाधियों के कारण बतलाया है, जिनमें निम्न मुख्य हैं-

  1. गुरुत्व (Heaviness)- भारी द्रव्य पृथ्वी की ओर गिरते हैं। अतः भारीपन कर्म का कारण होता है।
  2. तरलता (Fluidity)-तरल पदार्थों में गति दीख पड़ती है। यही कारण है कि जल में गति है।
  3. भावना- भावना के कारण जीवात्माओं में क्रियाशीलता होती है।
  4. संयोग- संयोग के कारण भी गति का आविर्भाव होता है। छत से फेंकी जाने वाली गेंद का संयोग जब पृथ्वी से होता है तो कर्म होता है।

वैशेषिक द्वारा कर्म पाँच प्रकार के माने गये हैं। ये पाँच प्रकार के कर्म इस प्रकार हैं-

  1. उत्क्षेपन (throwing upward)
  2. अवक्षेपन (downward movement)
  3. आकुञ्चन (contraction)
  4. प्रसारण (expansion)
  5. गमन (locomotion)

उत्क्षेपन:-

उत्क्षेपन उस कर्म को कहते हैं जिसके द्वारा वस्तु का संयोग ऊपर के प्रदेश से होता है।
पत्थर का आकाश की ओर फेंकना इस कर्म का उदाहरण है।

अवक्षेपन:-

अवक्षेपन उस कर्म को कहते हैं जिससे वस्तु का नीचे के प्रदेश से संयोग होता है।
छत पर से नीचे की ओर पत्थर फेंकना अवक्षेपन है ।

वैशेषिक-दर्शन में उत्क्षेपन तथा अवक्षेपन को ऊखल तथा मूसल के उदाहरण के द्वारा बतलाया गया है। 'हाथ की गति से मूसल ऊपर उठता है', यह उच्क्षेपन है। 'हाथ की गति से मूसल नीचे लाया जाता है' जिसके फलस्वरुप इसका संयोग 'ऊखल' से ही होता है। इस क्रिया को अवक्षेपन कहा जाता है।
हवा के प्रभाव से धूल, पत्ते, कागज आदि का ऊपर जाना उत्क्षेपन है।
आँधी, तूफान, भूकम्प आदि के फलस्वरुप पेड़, पौधे, मकान आदि का गिरना अवक्षेपन के उदाहरण हैं।

आकुञ्चन:-

आकुञ्चन सिकोड़ना है। यह वह क्रिया है जिसके द्वारा वस्तु के अवयव एक दूसरे के निकट आ जाते हैं।
हाथ-पैर मोड़ना आकुञ्चन का उदाहरण है।

प्रसारण:-

प्रसारण का अर्थ फैलाना है। इस कर्म के द्वारा वस्तु के अवयव एक दूसरे से दूर हो जाते हैं। मुड़े हुए कागज को पहले जैसा कर देना इस कर्म का उदाहरण है।
मोड़े हुए हाथ, पैर, वस्त्र आदि को फैलाना 'प्रसारण' का उदाहरण है ।

गमन:-

ऊपर बतलाये गये चार प्रकार के कर्म के अतिरिक्त सभी प्रकार के कर्म गमन में शामिल हैं। भ्रमण, आग की लपट का ऊपर की ओर उठना, बालक का दौड़ना इत्यादि गमन के विविध रुप है।

FAQ:-

1. भारतीय दर्शन में कर्म का सिद्धांत क्या है?

उत्तर :-भारतीय दर्शन में कर्म का अर्थ केवल कोई कार्य करना नहीं है, बल्कि व्यक्ति द्वारा किए गए कार्यों और उनके परिणामों से है। सामान्य रूप से माना जाता है कि मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्मों का प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है। अच्छे कर्मों से शुभ परिणाम और बुरे कर्मों से अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।

2. वैशेषिक दर्शन में कर्म कितने प्रकार के हैं?

उत्तर :-वैशेषिक दर्शन में कर्म के पाँच प्रकार माने गए हैं। ये हैं—उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण और गमन। इन पाँचों के माध्यम से वस्तुओं की विभिन्न प्रकार की गति या क्रिया को समझाया गया है।

3. वैशेषिक दर्शन में कर्म क्या है?

उत्तर :-वैशेषिक दर्शन में कर्म को गति या क्रिया के रूप में समझा गया है। कर्म किसी द्रव्य में होने वाली वह विशेष गतिविधि है, जिसके कारण उसकी स्थिति या स्थान में परिवर्तन हो सकता है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार कर्म का आश्रय केवल मूर्त द्रव्य होते हैं। सरल शब्दों में, किसी वस्तु का चलना, ऊपर जाना, नीचे आना, सिकुड़ना या फैलना कर्म के उदाहरण हैं।

4. वैशेषिक दर्शन में पाँच प्रकार के कर्म कौन-कौन से हैं?

उत्तर :-वैशेषिक दर्शन में कर्म के पाँच प्रमुख प्रकार बताए गए हैं— उत्क्षेपण — किसी वस्तु का ऊपर की ओर जाना। अवक्षेपण — किसी वस्तु का नीचे की ओर जाना। आकुञ्चन — किसी वस्तु का सिकुड़ना या संकुचित होना। प्रसारण — किसी वस्तु का फैलना या विस्तृत होना। गमन — एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाना।

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