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सामान्य क्या है? वैशेषिक दर्शन में सामान्य का अर्थ, एवं प्रकार

सामान्य (Universality or Generality) का अर्थ

सामान्य वैशेषिक-दर्शन का चौथा पदार्थ है। सामान्य वह पदार्थ है "जिसके कारण एक ही प्रकार के अलग-अलग व्यक्तियों को एक जाति के अन्दर रखा जाता है।" उदाहरणस्वरुप राम, श्याम, यदु, रहीम इत्यादि मनुष्यों में भित्रता होने के बावजूद उन सबों को मनुष्य कहा जाता है। यही बात गाय, घोड़ा इत्यादि जातिवाचक शब्द पर लागू होती है। संसार की समस्त गायों को गाय के वर्ग में रखा जाता है।

राम, श्याम, यदु, रहीम=मनुष्यत्व
1गाय, 2गाय, 3गाय=गोत्व
इस प्रकार सामान्य अनेक व्यक्तियों में पाई जाने वाली वह समान सत्ता है, जिसके कारण उन्हें एक ही वर्ग में रखा जाता है।

वैशेषिक दर्शन में सामान्य : अर्थ और  प्रकार

सामान्य क्या है

अब प्रश्न यह उठता है कि वह कौन-सी वस्तु है जिसके आधार पर संसार की विभित्र वस्तुओं को एक नाम से पुकारा जाता है ? उसी सत्ता को सामान्य कहा जाता है। सभी जातिवाचक शब्दों में कुछ सामान्य गुण पाये जाते हैं जिनके आधार पर उन्हें भिन्न-भिन्न वर्गों में रखा जाता है। संसार के सभी व्यक्तियों में 'मनुष्यत्व' समाविष्ट रहने के कारण उन्हें मनुष्य वर्ग में रखा जाता है। इसी प्रकार संसार की समस्त गायों में 'गोत्व' (cowness) सामान्य के निहित रहने के कारण उन्हें गाय कहा जाता है तथा गाय-वर्ग में रखा जाता है। इस विवेचन से सिद्ध होता है कि सामान्य व्यक्तियों अथवा वस्तुओं में समानता प्रस्तावित करती है।

भारतीय विचारधारा में सामान्य के सम्बन्ध में तीन मत हैं-

नामवाद (Nominalism):-

  • इस मत के अनुसार व्यक्ति से स्वतंत्र सामान्य की सत्ता नहीं है ।
  • सामान्य एक प्रकार का नाम है।
  • सामान्य व्यक्तियों का साझा(Common) आवश्यक धर्म न होकर सिर्फ नाममात्र है।
  • गाय को गाय कहलाने का यह कारण नहीं है कि सभी गायों में सामान्य और आवश्यक गुण 'गोत्व' निहित है बल्कि गाय को गाय कहलाने का कारण यह है कि वह अन्य जानवरों-जैसे घोड़ा, हाथी, भैंस इत्यादि से अलग है।
  • व्यावहारिक जीवन को सफल बनाने के लिए अलग-अलग वर्गों के व्यक्तियों का अलग-अलग नामकरण किया गया है।

इस मत में सामान्य की सत्ता का निषेध हुआ है। इस मत का समर्थक बौद्ध दर्शन कहा जाता है।

प्रत्ययवाद (Conceptualism):-

  • इस मत के अनुसार सामान्य मानसिक प्रत्यय(Concept) है। प्रत्यय का निर्माण व्यक्तियों के सर्वनिष्ठ(Common) आवश्यक धर्म के आधार पर होता है।
  • इसीलिए इस मत के अनुसार व्यक्ति और सामान्य अलग नहीं है।
  • सामान्य व्यक्तियों का आन्तरिक स्वरुप है जिसे बुद्धि ग्रहण करती है।

इस मत के पोषक जैन-मत और अद्वैत वेदान्त दर्शन हैं।

वस्तुवाद (Realism):-

  • इस मत के अनुसार सामान्य की स्वतन्त्र सत्ता है।
  • सामान्य व्यक्तियों का नाममात्र अथवा मानसिक प्रत्यय न होकर यथार्थवाद है।
  • इसी कारण इस मत को वस्तुवादी मत (Realistic view) कहा जाता है।

इस मत के समर्थक न्याय और वैशेषिक दर्शन कहे जाते हैं।

'न्याय वैशेषिक' में सामान्य की विशेषताओं को इस प्रकार व्यक्त किया गया है

'नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्'
दूसरे शब्दों में सामान्य 'नित्य' 'एक' और 'अनेक वस्तुओं' में समाविष्ट है।

'सामान्य एक है'

एक वर्ग के सभी व्यक्तियों में 'एक' ही सामान्य होता है। इसका कारण यह है कि एक वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों का एक ही आवश्यक गुण होता है। मनुष्य का सामान्य गुण 'मनुष्यत्व' और गाय का सामान्य गुण 'गोत्त्व' होता है। यदि एक ही वर्ग के व्यक्तियों के दो सामान्य होते तो वे (सामान्य) परस्पर विरोधी होते।

'सामान्य नित्य है'

व्यक्तियो का जन्म होता है, नाश होता है परन्तु उनका सामान्य अविनाशी होता है। उदाहरणस्वरुप मनुष्यों का जन्म और उनकी मृत्यु होती है, परन्तु उनका सामान्य 'मनुष्यत्व' शाश्वत(अमर) है। सामान्य 'अनादि' और 'अनन्त' है।

'एक ही सामान्य वर्ग के भित्र-भिन्न व्यक्तियों में समाविष्ट रहता है'

'मनुष्यत्व' सामान्य संसार के सभी मनुष्यों में निहित है।'गोत्व' सामान्य विश्व की समस्त गायों में समाविष्ट है। यही कारण है कि सामान्य अनेकानुगत (अनेक व्यक्तियों में समवेत) है।
सामान्य की तीसरी विशेषता से यह निष्कर्ष निकलता है कि अकेले व्यक्ति का सामान्य नहीं हो सकता। आकाश एक है। अतः आकाश का सामान्य 'आकाशत्व' को ठहराना भूल है।

वैशेषिक दर्शन में सामान्य कहाँ रहता है

वैशेषिक के मतानुसार सामान्य द्रव्य, गुण और कर्म में रहता है।

  • द्रव्यत्व (Substantiality) सब द्रव्यों में रहने वाला सामान्य है।
  • रुपत्व सभी रूपों में निवास करने वाला सामान्य है।
  • 'कर्मत्व' सभी कर्मों का सामान्य है।

  • विशेष, समवाय और अभाव का सामान्य नहीं होता है।

सामान्य में सामान्य नहीं होता है।

यदि सामान्य का सामान्य माना जाय, तो एक सामान्य में दूसरा सामान्य और दूसरे सामान्य में तीसरा सामान्य मानना पड़ेगा। इस प्रकार चलते-चलते अनवस्था दोष का सामना करना पडेगा। इस दोष से बचने के लिए सामान्य में सामान्य की सत्ता नहीं मानी जाती है।

सामान्य का ज्ञान कैसे होता है

न्याय-वैशेषिक के मतानुसार सामान्य का ज्ञान सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष के द्वारा सम्भव होता है । उनका कहना है कि जब हम राम, श्याम आदि किसी मनुष्य का प्रत्यक्षीकरण करते हैं तो 'मनुष्यत्व' का भी इसके साथ प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि मनुष्यत्व का प्रत्यक्ष किये बिना कैसे जाना जा सकता है कि अमुक व्यक्ति मनुष्य है। इस प्रकार न्याय-वैशेषिक दर्शन में सामान्य गुण के प्रत्यक्ष के द्वारा वर्ग का प्रत्यक्ष होता है। इसी असाधारण प्रत्यक्ष को सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष कहा जाता है।

सामान्य और व्यक्ति का सम्बन्ध

सामान्य और व्यक्ति के बीच समवाय सम्बन्ध है। उदाहरणस्वरुप राम, श्याम आदि मनुष्य का मनुष्यत्व के साथ समवाय सम्बन्ध है ।

सामान्य और गुण में अंतर

  • सामान्य गुण से अलग है।
  • गुण का नाश होता है। जैसे गुलाब की 'गुलाबी' गुलाब के नष्ट होने के साथ ही समाप्त हो जाती है।
  • परन्तु सामान्य नित्य है। सामान्य का क्षेत्र गुण के क्षेत्र से व्यापक है।
  • गुण के अतिरिक्त द्रव्य और कर्म में भी सामान्य निवास करता है।
  • सामान्य को गुण मान लेने से द्रव्य और कर्म इसके क्षेत्र से बाहर हो जायेंगे।
  • अतः सामान्य गुण से पृथक् है।

सामान्य और समवाय में अंतर

  • सामान्य समवाय से अलग है।
  • समवाय एक प्रकार का सम्बन्ध है।
  • परन्तु सामान्य वास्तविकता है।

सामान्य और अभाव में अंतर

  • सामान्य अभाव से अलग है।
  • सामान्य भाव-पदार्थ है।
  • जबकि अभाव इसके विपरीत निषेधात्मक पदार्थ (negative category) है।
सामान्य के सम्बन्ध में एक बात पर ध्यान देना आवश्यक है। यद्यपि सामान्य वास्तविक है, फिर भी वह अन्य वस्तुओं की तरह काल और समय में स्थित नहीं है। पाश्चात्य दर्शन सामान्य के इस स्वरुप की व्याख्या के लिये एक शब्द का प्रयोग करता है। सामान्य पाश्चात्य दर्शन के शब्द में 'Exist' नहीं करता है, अपितु 'Subsist' करता है। उसमें सत्ताभाव है, अस्तित्व नहीं ।

वैशेषिक दर्शन में सामान्य के तीन प्रकार होते हैं-

  1. पर
  2. अपर
  3. परापर

पर

पर-सामान्य उस सामान्य को कहा जाता है जो अत्यधिक व्यापक है। पर-सामान्य का अर्थ है सबसे बड़ा सामान्य । सत्ता (Being-hood) पर-सामान्य का उदाहरण है। इस सामान्य के अन्दर सभी सामान्य समाविष्ट हैं।

अपर

सबसे छोटे सामान्य को 'अपर' सामान्य कहा जाता है। इस सामान्य का उदाहरण घटत्व (Potness) है। यह सामान्य घट में सीमित होने के कारण 'अपर' है।

परापर

बीच के सामान्य को परापर सामान्य कहा जाता है। इस सामान्य का उदाहरण द्रव्यत्व (Substantiality) है। यह सामान्य 'घट' की अपेक्षा बड़ा है और सत्ता की अपेक्षा छोटा है। सत्ता द्रव्य, गुण और कर्म में समवेत है जबकि द्रव्यत्व सामान्य सिर्फ द्रव्य में समाविष्ट है। सामान्य का यह भेद व्यापकता की दृष्टि से अपनाया गया है।

FAQ:-

1.सामान्य क्या है?

उत्तर:- वैशेषिक दर्शन में सामान्य वह नित्य तत्व है, जो अनेक व्यक्तियों या वस्तुओं में समान रूप से पाया जाता है। इसी के कारण उन्हें एक ही वर्ग में रखा जाता है, जैसे सभी मनुष्यों में मनुष्यत्व।

2. पर सामान्य क्या है?

उत्तर:- पर सामान्य सबसे अधिक व्यापक सामान्य है। यह सभी सामान्यों में सर्वोच्च माना जाता है। सत्ता (Being) इसका प्रमुख उदाहरण है।

3. अपर सामान्य क्या है?

उत्तर:- अपर सामान्य सबसे कम व्यापक सामान्य है। यह किसी एक सीमित वर्ग तक ही रहता है। घटत्व इसका प्रमुख उदाहरण है।

4. वैशेषिक दर्शन में सामान्य के कितने प्रकार हैं?

उत्तर:- वैशेषिक दर्शन में सामान्य तीन प्रकार का माना गया है—पर, परापर और अपर। इनका आधार सामान्य की व्यापकता है।

5. वैशेषिक दर्शन में सामान्य का अर्थ क्या है?

उत्तर:- सामान्य का अर्थ ऐसी नित्य सत्ता से है, जो अनेक व्यक्तियों में समान रूप से विद्यमान रहती है और उन्हें एक ही वर्ग का सदस्य बनाती है।

6. सामान्य की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:- सामान्य नित्य, एक और अनेक व्यक्तियों में विद्यमान रहता है। यह वास्तविक सत्ता है तथा द्रव्य, गुण और कर्म में पाया जाता है।

7. सामान्य का ज्ञान कैसे होता है?

उत्तर:- न्याय-वैशेषिक दर्शन के अनुसार सामान्य का ज्ञान सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष से होता है। किसी व्यक्ति को देखकर उसके सामान्य का भी ज्ञान हो जाता है।

8. सामान्य और विशेष में क्या अंतर है?

उत्तर:- सामान्य अनेक वस्तुओं में समानता स्थापित करता है, जबकि विशेष प्रत्येक वस्तु की अलग पहचान बताता है। दोनों का कार्य एक-दूसरे से भिन्न है।

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