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वैशेषिक दर्शन में अभाव पदार्थ क्या है? इसके प्रकार और उदाहरण

अभाव(Non-Existence) अभाव वैशेषिक-दर्शन का सातवाँ पदार्थ है। अन्य छः पदार्थ (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय) भाव-पदार्थ(Positive) हैं जबकि अभाव एकमात्र अभावात्मक(Negative) पदार्थ है। द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य, विशेष और समवाय निरपेक्ष पदार्थ हैं जबकि अभाव पदार्थ सापेक्षता के विचार पर आधारित है। अभाव 'किसी वस्तु का न होना कहा जाता है।' अभाव का अर्थ किसी वस्तु का किसी विशेष काल में किसी विशेष स्थान में अनुपस्थिति है। अभाव शून्य से भिन्न है। अभाव को शून्य समझना भ्रामक है। प्रो० हिरियन्ना ने कहा है "अभाव से हमें किसी विशेष स्थान और समय में किसी वस्तु की अनुपस्थिति समझनी चाहिये। अभाव का अर्थ शून्य नहीं है जिसे न्याय-वैशेषिक एक विचार शून्य या मिध्या धारणा कहकर उपेक्षा करता है। " वैशेषिक दर्शन में 'अभाव' का इतिहास वैशेषिक-दर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद ने अभाव का उल्लेख नहीं किया है। परन्तु वैशेषिक-सूत्र में अभाव को प्रमेय के रुप में माना गया है। प्रशस्तपाद ने वैशेषिक-सूत्र का भाष्य लिखते समय अभाव का विस्तृत वर्णन किया है। इसी कारण बाद में...

विशेष और समवाय क्या हैं? वैशेषिक दर्शन में अर्थ, उदाहरण एवं अंतर

वैशेषिक दर्शन में 'विशेष'(Particularity) क्या है? अर्थ और उदाहरण 'विशेष' वैशेषिक दर्शन का पाँचवाँ पदार्थ है। यह सामान्य के ठीक विपरीत है। विशेष नित्य द्रव्य की वह विशिष्टता है जिससे वह अन्य नित्य द्रव्यों से पहचाना जाता है। दिक्, काल आत्मा, मन, पृथ्वी, वायु, जल और अग्नि के परमाणुओं की विशिष्टता की व्याख्या के लिये विशेष को अपनाया जाता है। ये द्रव्य निरवयव (बिना किसी भाग या हिस्से के) होते है। अतः इन द्रव्यों को एक दूसरे से अलग करना काफी कठिन होता है। इतना ही नहीं, एक ही प्रकार के विभिन्न द्रव्यों को एक दूसरे से अलग करना काफी कठिन होता है। उदाहरण के लिए: एक जल के परमाणु को वायु के परमाणु से किस प्रकार का अन्तर बतलाया जाय? एक आत्मा को मन से किस प्रकार भिन्न समझा जाय? एक आत्मा और दूसरे आत्मा से क्या विभिन्नता है? एक मन और दूसरे मन में क्या विभिन्नता है? यदि इन द्रव्यों के अवयव(हिस्से) होते तो एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य से अवयव की भिन्नता के कारण अलग समझा जाता । परन्तु ये निरवयव हैं। अतः इन द्रव्यों में विशेष को समवेत माना जाता है। इसी 'विशेष' के कार...

सामान्य क्या है? वैशेषिक दर्शन में सामान्य का अर्थ, एवं प्रकार

सामान्य (Universality or Generality) का अर्थ सामान्य वैशेषिक-दर्शन का चौथा पदार्थ है। सामान्य वह पदार्थ है "जिसके कारण एक ही प्रकार के अलग-अलग व्यक्तियों को एक जाति के अन्दर रखा जाता है।" उदाहरणस्वरुप राम, श्याम, यदु, रहीम इत्यादि मनुष्यों में भित्रता होने के बावजूद उन सबों को मनुष्य कहा जाता है। यही बात गाय, घोड़ा इत्यादि जातिवाचक शब्द पर लागू होती है। संसार की समस्त गायों को गाय के वर्ग में रखा जाता है। राम, श्याम, यदु, रहीम= मनुष्यत्व 1गाय, 2गाय, 3गाय= गोत्व इस प्रकार सामान्य अनेक व्यक्तियों में पाई जाने वाली वह समान सत्ता है, जिसके कारण उन्हें एक ही वर्ग में रखा जाता है। सामान्य क्या है अब प्रश्न यह उठता है कि वह कौन-सी वस्तु है जिसके आधार पर संसार की विभित्र वस्तुओं को एक नाम से पुकारा जाता है ? उसी सत्ता को सामान्य कहा जाता है। सभी जातिवाचक शब्दों में कुछ सामान्य गुण पाये जाते हैं जिनके आधार पर उन्हें भिन्न-भिन्न वर्गों में रखा जाता है। संसार के सभी व्यक्तियों में 'मनुष्यत्व' समाविष्ट रहने के कारण उन्हें मनुष्य वर्ग में रखा जाता है। इसी प्रकार सं...

वैशेषिक दर्शन के अनुसार कर्म क्या है

वैशेषिक दर्शन में कर्म (Action) क्या है कर्म का आधार द्रव्य है। कर्म मूर्त्त द्रव्यों का गतिशील व्यापार है। मूर्त द्रव्य पाँच हैं- पृथ्वी जल वायु अग्नि मन कर्म का निवास इन्हीं द्रव्यों में होता है। कर्म का निवास सर्वव्यापी द्रव्यों में नहीं होता है, क्योंकि वे स्थान-परिवर्तन से शून्य हैं। कर्म द्रव्य का सक्रिय रुप है। द्रव्य की दो विशेषतायें हैं- सक्रियता निष्क्रियता कर्म द्रव्य का 'सक्रिय' रुप है जबकि गुण द्रव्य का 'निष्क्रिय' रुप है। कर्म निर्गुण है, गुण 'द्रव्य' में ही निर्भर रहता है, कर्म में नहीं। कर्म के द्वारा एक द्रव्य का दूसरे द्रव्यों से संयोग भी होता है। कर्म को इसीलिये संयोग और विभाग का साक्षात् कारण माना जाता है। गेंद को ऊपर फेंके जाने पर छत से संयुक्त होना कर्म के गति के द्वारा ही होता है। कर्म की परिभाषा है- द्रव्य में समवेत है, जो गुण से शून्य है, जो संयोग और विभाग का साक्षात् कारण है। कर्म गुण से भित्र है। गुण और कर्म में अंतर क्रम गुण कर्म ...

वैशेषिक दर्शन के 24 गुण कौन कौन से हैं

वैशेषिक दर्शन में गुण (Quality) क्या है 'गुण' वैशेषिक दर्शन का दूसरा पदार्थ है। गुण ' द्रव्य' में निवास करता है। इसलिये गुण को अकेला नहीं पाया जा सकता। गुण का दूसरा लक्षण यह है कि यह 'गुण' से शून्य है—अर्थात द्रव्य का गुण होता है, परन्तु गुण का कोई गुण नहीं होता है। यदि गुण का गुण खोजा जाय, तो निराशा होगी। गुण कर्म से भी शून्य है। गुण में गति का अभाव होता है। गुण द्रव्य का वह रुप है जो निष्क्रिय (गतिहीन) है। गुण संयोग और विभाग (वियोग) का साक्षात् कारण नहीं होता है। (कलम और हाथ के सम्पर्क होने से जो सम्बन्ध होता है उसे संयोग कहते हैं।) संयोग का अन्त विभाग (वियोग) से होता है। गुण निष्क्रिय होने के कारण संयोग और विभाग का कारण नहीं है। गुण, गौण रुप से वस्तु (द्रव्य) में रहकर सहायक होता है। इसलिये गुण को असमवायी कारण (non-material cause) कहा जाता है। असमवायी कारण का सुंदर उदाहरण सूत (धागे) का रंग है, जो सूत में संयुक्त होकर उससे निर्मित होने वाले 'वस्त्र' के रूप और स्वरूप को निर्धारित करता है। गुण की परिभाषा गुण वह है- जो द्रव्य में समवेत है, ...

वैशेषिक दर्शन में द्रव्य (Dravya) क्या है परिभाषा, 9 द्रव्य, प्रकार,

वैशेषिक दर्शन में संपूर्ण ब्रह्मांड के तत्वों को समझने के लिए 7 पदार्थों (Padarthas) की विवेचना की गई है। इन सात पदार्थों में सबसे पहला पदार्थ 'द्रव्य' (Dravya) है। सरल शब्दों में कहें तो द्रव्य वह सत्ता है जिसमें गुण (Qualities) और कर्म (Actions) विद्यमान रहते हैं और जो सृष्टि का समवायी कारण (Inherent Cause) है। यदि आप भारतीय दर्शन में 'द्रव्य क्या है?', इसकी सटीक परिभाषा और इसके भेदों को विस्तार से समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है। आज के इस विस्तृत लेख में हम वैशेषिक दर्शन के अनुसार द्रव्य के स्वरूप और इसके 9 भेदों (9 Dravyas) की गहराई से चर्चा करेंगे। द्रव्य क्या है द्रव्य वैशेषिक दर्शन का प्रथम पदार्थ है। वैशेषिक दर्शन के संस्थापक महर्षि कणाद अपने ग्रथों में 7 पदार्थों का वर्णन किया है। जिसमें द्रव्य पहला एवं महत्वपूर्ण पदार्थ है। द्रव्य वह आधार है "जिसमें गुण और कर्म मौजूद हो" वैशेषिक दर्शन के अनुसार संसार की सभी वस्तुएँ किसी न किसी द्रव्य पर आधारित है। इसलिए वस्तुओं के स्वरूप और उसके गुणों को समझने के लिए द्रव्य का ज्ञान होना अत्यंत आव...

वैशेषिक दर्शन क्या है? (Vaisheshik Darshan in Hindi)

भारतीय दर्शन की समृद्ध परंपरा में वैशेषिक दर्शन का विशेष स्थान है। यह दर्शन संसार की वस्तुओं, उनके गुणों और उनके वास्तविक स्वरूप को समझाने का प्रयास करता है। भारतीय चिंतन परंपरा में जहाँ कुछ दर्शन आत्मा, मोक्ष और आध्यात्मिकता पर अधिक बल देते हैं, वहीं वैशेषिक दर्शन संसार की वस्तुओं का विश्लेषण करके उनके अस्तित्व और संरचना को समझने का प्रयास करता है। वैशेषिक दर्शन को भारतीय दर्शन की सबसे तार्किक और वैज्ञानिक विचारधाराओं में से एक माना जाता है। इस दर्शन में वस्तुओं को विभिन्न वर्गों में विभाजित करके उनके गुणों और विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है। यही कारण है कि यह दर्शन केवल धार्मिक या आध्यात्मिक विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, तर्क और वास्तविकता की खोज से भी जुड़ा हुआ है। यदि सरल शब्दों में कहा जाए, तो वैशेषिक दर्शन हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि संसार किन तत्वों से बना है, वस्तुओं की पहचान कैसे होती है और उनके बीच संबंध किस प्रकार स्थापित होते हैं। वैशेषिक दर्शन क्या है? वैशेषिक दर्शन भारतीय दर्शन की छह आस्तिक दर्शनों में से एक महत्वपूर्ण दर्शन है। इसका प्रतिपादन महर्...